चाहत...
सावन की सी बारिशों में नित भीगने की अब चाह कहाँ,पुष्प खिले, धरा फले ओ भीगे कंठ इतना सा तो पानी हो दुनिया जीतने का जज्बा, आसमां चीरने का भी जोश, कहाँ जाता हैं जब नन्ही सी बेटी से हार खानी हो ऑस्कर, बुकर और पुलित्ज़र जैसे तमगे किसे चाहिए,जो सीधे दिल...
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चेतना के स्वर
कविता
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[09 Feb 2010 10:53 AM]



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