आदमी कैसे कैसे जीना सीख गया है
पाना-खोना झूठा, छोड़ के जानी दुनियांफिर भी कितने ख्वाब संजोना सीख गया हैआदमी कैसे कैसे जीना सीख गया हैधो धोकर पीता है चरणरज मक्कारों कीजहर भी, और बहुत कुछ पीना सीख गया हैआदमी कैसे कैसे जीना सीख गया हैचौराहों पर मौतों से कोई फर्क नहीं हैआदमी, कितने आतंकों...
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Rajey Sha
एवंई
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[09 Feb 2010 08:27 AM]



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