सुख का किश्तों पर मिलना-हास्य कविताएँ (sukh kishton men-hasya kavitaen)

 हिन्द केसरी-पत्रिका आंधी चलकर फिर रुक जाती है धरती हिलती नहीं भले कांपती नजर आती है। मौसम रोज बदलते हैं उससे तेज भागते हैं, आदमी के इरादे पर सांसें उसकी भी कभी न कभी उखड़ जाती हैं फिर भी जिंदगी वहीं खड़ी रहती है भले अपना घर और दरवाजे बदलती जाती... [पूरी पोस्ट]
writer दीपक भारतदीप

अभिव्यक्तिअनुभूतिमनोरंजनइंटरनेट

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[29 Aug 2009 12:52 PM]

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