आकाश की आत्मकथा[कविता]- जयप्रकाश मानस

साहित्य शिल्पी नितांत एकाकी नदी हूँ जब कोई न था, जब कुछ भी नहीं रहेगा अंत के बाद भी बहता रहूँगा वह उस दुनिया का सबसे बड़ा भ्रम ही है जिन्हें दीखता है मेरी गोद में सूर्य, चंद्र, सितारे नक्षत्र उनसे भी अलग एकदम अकेला अपने रचयिता का सुनसान के सिवाय कुछ भी नहीं हूँ मैं... [पूरी पोस्ट]
writer साहित्य-शिल्पी

कविता

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[09 Feb 2010 02:30 AM]

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