apni baat! Umesh Pathak ke saath.
उमेश पाठक -मित्रो, आज काफी दिनों के बाद कुछ लिखने बैठा हूं ,सच तो ये है की "रोजी-रोटी की चकरघिन्नी" से वक्त थोडा निकालना मुश्किल हो जाता है! बहरहाल ....बचपन की सुनी-पढ़ी कुछ कविताओं की पक्तियां जो कभी हममें जोश भर देती हैं तो कभी आत्मविश्वाश ! आज आप सभी...
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Umesh Pathak / उमेश पाठक
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[08 Feb 2010 09:45 AM]



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