ग़ज़ल
पहले नहीं हम लुटने वाले ,आँखों के बाज़ार में !जाने कितने टकरायें अभी , शीशे की दीवार में !ख़त पढ़ते ही रो देंगे वो ,ऐसा तो गुमां ना था ,तौबा कितना दम होता है , कागज़ की कटार में !निसार उनपे क्या किया ,शायद कुछ हिसाब लगे ,पाना तो होता ही नहीं , दिल के अंधे...
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sanjeev kuralia
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[08 Feb 2010 09:15 AM]



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