फागुन मतवारो यह ऐसो परपंच रच्यौ..
’आचारज जी’ का आह्वान सुन लपके ही थे कि तिमिरान्ध हो गये (यूँ फगुनान्ध होने को बुलाये गये थे ) । बिजली फिर ब्रॉडबैण्ड - दोनों ही रूठ गये । उस वक्त जो लिखा था, पोस्ट नहीं कर पाया । अभी कर रहा हूँ, कारण खुद को जोड़ने की क़वायद है महोत्सव से -(१)ठौर-ठौर...
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हिमांशु । Himanshu
होली है
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[08 Feb 2010 07:35 AM]



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