संगदिल दिल्ली में दिल्लगी

मन उवाच..... चित्तरकार कई दिन से सड़कों से नदारद थे। गली, मोहल्ले और पार्कों के कोने उनके प्रेम में भीगने को तरस गए थे। सड़कों पर उनकी चप्पलों की रगड़ सुनाई नहीं दी तो चिंता हुई। जा पहुंचा ठौर पर। ज़नाब छाती पर ठुड्डी रखे गदही मुद्रा में सोच रहे थे। होठों पर पान के... [पूरी पोस्ट]
writer मधुकर राजपूत
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[08 Feb 2010 04:25 AM]

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