बस इतनी सी चाहत...

चेतना के स्वर उजाले की ओर सावन कि सी बारिशों  में नित भीगने की अब चाह कहाँ,पुष्प खिले, धरा फले  ओ भीगे कंठ इतना सा तो पानी हो ||दुनिया जीतने का जज्बा, आसमां चीरने का भी जोश, कहाँ जाता हैं जब नन्ही सी बेटी से हार खानी हो ||ऑस्कर, बुकर और पुलित्ज़र जैसे... [पूरी पोस्ट]
writer चेतना के स्वर

कविता

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[08 Feb 2010 03:10 AM]

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