बस इतनी सी चाहत...
सावन कि सी बारिशों में नित भीगने की अब चाह कहाँ,पुष्प खिले, धरा फले ओ भीगे कंठ इतना सा तो पानी हो ||दुनिया जीतने का जज्बा, आसमां चीरने का भी जोश, कहाँ जाता हैं जब नन्ही सी बेटी से हार खानी हो ||ऑस्कर, बुकर और पुलित्ज़र जैसे...
[पूरी पोस्ट]
चेतना के स्वर
कविता
16
0
0
0
2
[08 Feb 2010 03:10 AM]



Shuffle








