कभी कभी गुनगुना लिया है

गीत कलश जो भी आधा और अधूरा शब्द मिला मुझको राहों मेंमैने उसको पिरो छन्द में कभी कभी गुनगुना लिया हैजितनी देर टिके पाटल पटपके हुए भोर के आंसूउतनी देर टिकी बस आकरहै मुस्कान अधर पर मेरेजितनी देर रात पूनम की करती लहरों से अठखेलीउतनी देर रहा करते हैंआकर पथ में घिरे... [पूरी पोस्ट]
writer राकेश खंडेलवाल
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[07 Feb 2010 21:36 PM]

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