जिज्ञासा
अपने अधूरेपन की तलाश मुझे यात्रा पर ले जाती है। जहाँ वह मुझे अन्जान रास्तो पर अंन्जान लोगो के बीच बहुत खेल खिलाती है। मेरा तमाशा बनाती है। लेकिन मेरी हताशा देख कर कोई आवाज मुझे बुलाती है मुझे समझाती है- इस जिज्ञासा को जलाए रखे अपने भीतर। देर सबेर रास्ता...
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परमजीत बाली
अध्यात्मिक
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[07 Feb 2010 19:15 PM]



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