भावनाएँ बर्फ़ बन गईं

अनुभूति कलश मानव की भावनाएँ आज बर्फ़ बन गईं ज़िन्दगी की हर खुशी बस दर्द बन गईं। मीठा जहर पिला रहा मानव को मानव आज, प्रतिशोध की आग में सब जर्द बन गईं । इन्सानियत को ढूँढ़ते सदियाँ गुजर गईं, इंसा को इंसा डस रहा बस सर्प बन गईं । हर खुशी का लम्हा है दहशत भरा हुआ ज़िन्दगी की... [पूरी पोस्ट]
writer ramadwivedi

geetगीत

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[07 Feb 2010 12:09 PM]

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