मनोभिलाष
सवेरे का वक्त था, आसमान कुछ आर्द्र, हल्का नीला हरित पत्तियों पर ठिठकी नन्हीं-नन्हीं जल की कुछ बूँदें, प्रकृति की सुघड़-स्वच्छ घटा में बारिश की आड़ी-तिरछी-फुहार मदोन्माद से बहता खुला-खुला-सा निरंकुश नाला सुदूर पूरबी क्षितिज से झाँकते धुँधले नीले पहाड़, तब...
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Amitraghat
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[07 Feb 2010 00:55 AM]



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