सच की लड़ाई

मनोरमा सवालों से लड़कर सँवरता गया हूँ।विवादों से हँटकर उभरता गया हूँ।जो खुशबू सुमन की बनाया है खुद को,जहाँ तक पहुँच है छिड़कता गया हूँ।।यूँ दुनिया से लड़ना कठिन काम यारो।है खुद को बदलना हरएक शाम यारो।मेरी जो भी फितरत ये दुनिया भी वैसी,हो कोशिश कभी न हों बदनाम... [पूरी पोस्ट]
writer श्यामल सुमन

कविता

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[06 Feb 2010 23:21 PM]

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