स्मृति

क्षितिज हवा की तरह लिपट जाती है, छाया की तरह पीछे पीछे चलती है। पुकारने पर मेरी ही आवाज़, देर तक खंडहरों में गूंजती है आज उसे क्या हुआ है,बार बार मुझे छल जाती है। प्रवंचना की ऐसी सुलगती आग । ठगिनी कितनी बार,कितने जोगी का ऱूप लेकर पर्वत की ऊंचाइयों को लांघ कर,... [पूरी पोस्ट]
writer उषा वर्मा

कविता

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[06 Feb 2010 11:24 AM]

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