हमारे प्रेम के विरुद्ध…हम…फिर भी ज़िंदा चाहत-संगीत
हर बार उभर आते हैंमेरे चेहरे परतुम्हारे प्रेम के निशानतबजब हम मिलते हैंसूरज मुस्कराता हैऔर, और तेज़ बहने लगती है नदीफर्राटा भर-भर हांफ उठती हैधरतीपर ये उन्माद नहीये सब करते हैंव्यंग्यहम परहम भी लगातार निचोड़ते रहेअपने-अपने हिस्से का...
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चण्डीदत्त शुक्ल
कह रहा हूं तुमसे
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[06 Feb 2010 10:18 AM]



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