मन
अभी भी मन करता है घूम आऊं किताबों के मेले में पलटूं एक-एक पन्ना और घर आऊं तो तैयार मिले मां के हाथों का खाना पिता की चिंता लौटूं तो इत्मीनान से खोलूं किताबों का थैला महसूसूं खुशबू ताजे छपे पन्नों की उनकी जिल्द पर जडूं इतिहास होता वर्तमान- अपना नाम,...
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डॉ वर्तिका नन्दा
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[06 Feb 2010 01:59 AM]



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