छू आई बादल के गाँव

मानसी छू आई बादल के गाँव बहुत दिनों के बाद सखी रीउमड़ घुमड़ करगरजी बरसीबीते मौसम में हो आईधो आई स्मृतियों के ठाँवछू आई बादल के गाँवकुनमुन सी ये धूप सुनहरीबस इक क्षण कीबनी सहचरी फिर पायल बन रुनझुन में ढलसज गई दो सखियन के पांवछू आई बादल के गाँवमछली कंटकफँसी... [पूरी पोस्ट]
writer मानसी

poetry

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[05 Feb 2010 23:46 PM]

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