रसभरी ---(किशोर प्रेम की कोमलांगी कहानी)
इसी कहानी के दो अंश- १-- [एक अजीब मिठास लिये रसभरियों का, कसैला स्वाद मुझे कभी नहीं भाया था। हाँ उन्हें देखना अलबत्ता मुझे अच्छा लगता था; उन्हें देख मुझे यूँ लगता था जैसे कोई गदराया बदन, कल्फ लगी मलमल की साड़ी से बाहर निकला जा रहा हो। मुझे रसभरी के झीने...
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श्याम सखा 'श्याम'
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[05 Feb 2010 22:08 PM]



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