प्रस्तर मन
मानव मन बना है प्रस्तर मानव क्या लेकर जाएगा,मिटटी में खुद मिल जाएगा, इस जग में फिर कैसे कैसे, ढ़ो रहा आडंबर .मानव मन बना है प्रस्तर . पैसा पापों का मूल बना,हर रिश्ता लगता शूल बना, अपने हाथ अपनों को मार, नाच रहा दिगंबर .मानव मन बना है प्रस्तर . छल, कपट,...
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Kavi Kulwant
प्रस्तर मन
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[05 Feb 2010 10:43 AM]



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