सजना है मगर जीवन के लिए
जैसा देश-वैसा भेष...! इस मुहावरे को स्थानांतरित कीजिये और जाइये बाज़ार से एक अच्छा-सा व्यक्तित्व खरीद लाइए. यह अपील न अटपटी लगनी चाहिए, न इसपर चौंकने की जरूरत है. यही हो रहा है. रमैया की दुल्हिन बाज़ार नहीं लूट रही है, बाज़ार उसको लूट रहा है. बल्कि वोह तो...
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अरविन्द चतुर्वेद
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[05 Feb 2010 11:10 AM]



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