ज़रूरत
जाने कैसे,रातें उड़ जाती हैं,या परछाइयों की तरह,घटती बढती रहती हैं,दिन बंजर लगते हैंया सूखे की धरती जैसे,चटके-चटकेपर वक्त गुज़र ही जाता हैचांदनी बिखरी-बिखरीकुछ नमी छोड़ जाती हैखुश्क होते लबों परफिर एक एहसास भीग जाता हैये ख़याल और भी पुख्ता हो जाता हैकि...
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Jyotsna Pandey
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[05 Feb 2010 09:09 AM]



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