उठो सुबह हो चुकी चमक रहा आफताब देखो
इससे पहले कि गीली आँखों में तेज़ाब देखो होश में आओ रहनुमाओं वर्ना इंकलाब देखो हक़ मार जाते हो तुम अपने ही खिदमतगार के
रगों में इसके खून नहीं सुलगता अलाव देखो जंगल पहाड़ उजाड़ कर ये कैसी तरक्की पाई है चार दिन कि जिंदगी में कुदरत के सौ अज़ाब देखो जमीन मकान...
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सुलभ § सतरंगी
ग़ज़ल
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[05 Feb 2010 04:30 AM]



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