धुआँ धुआँ हो करके उठा
दिल तपता है , किसने देखा अँगारों कोवो जो धुआँ धुआँ हो करके उठा , उसे उम्र लगी परवानों की ढलती है शमा , पिघली जो है ये अश्कों मेंछा जाती है अफसानों सी , इसे उम्र लगी बलिदानों कीरँग कोई हुआ , गुलाल हुआ या मलाल हुआमिल जाता है इन्सां के खूँ में , इसे उम्र...
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शारदा अरोरा
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[05 Feb 2010 02:26 AM]



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