आपका फिर व्यर्थ है कहना लिखूँ मैं गीत कोई
शब्द से होता नहीं है अब समन्वय भावना कारागिनी फिर गुनगुनाये, है न संभव गीत कोईखो चुकी है मुस्कुराहट, पथ अधर की वीथिका कानैन नभ से सावनी बादल विदा लेते नहीं हैंकंठ से डाले हुए हैं सात फ़ेरे सिसकियों नेपल दिवस के एक क्षण विश्रांति का देते नहीं हैटूट बिखरी...
[पूरी पोस्ट]
राकेश खंडेलवाल
Blog Likhi
18
3
0
3
4
[04 Feb 2010 21:24 PM]



Shuffle








