दो मुख्तलिफ गज़लें
ग़ज़ल ०९ जब नाम तिरा सूझे ,जब ध्यान तिरा आवे इक ग़म तिरे मजनू की ज़ंजीर हिला जावे ! सब की तो सुनूँ लोहू ये आँख न टपकावे कीधर से कोई ऐसा दिल और जिगर लावे ! जी को न लगाना तुम ,इक आन किसू से भी सब हुस्न के धोखे हैं ,सब इश्क़ के बहलावे ! ख़ुद अपना नाविश्ता है...
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आनन्द पाठक
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[04 Feb 2010 09:55 AM]



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