नींद में खड़ी रहे रेलगाड़ी
जब शहर में तुम नहीं होतीतो रहें वे सारी चीजेंजिन्हें छोड़कर तुम चली गईस्टेशन पर खड़ी थी जो रेलगाड़ीकुछ दिनों तक नींद में पड़ी रहेघड़ी में सात बजेंऔर समय थककर बैठ जायखो जायें चाभियाँ बाज़ार के दुकानों कीमेरी जेब में बचे रहेंछाछठ रूपये नब्बे पैसेचप्पलें बीमार...
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चन्दन
कविता
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[04 Feb 2010 08:16 AM]



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