नींद में खड़ी रहे रेलगाड़ी

नई बात जब शहर में तुम नहीं होतीतो रहें वे सारी चीजेंजिन्हें छोड़कर तुम चली गईस्टेशन पर खड़ी थी जो रेलगाड़ीकुछ दिनों तक नींद में पड़ी रहेघड़ी में सात बजेंऔर समय थककर बैठ जायखो जायें चाभियाँ बाज़ार के दुकानों कीमेरी जेब में बचे रहेंछाछठ रूपये नब्बे पैसेचप्पलें बीमार... [पूरी पोस्ट]
writer चन्दन

कविता

views
12
upvote
0
downvote
0
rating
0
comments
4
[04 Feb 2010 08:16 AM]

Free Vedic Astrology From Astrobix