जैन साहब का पत्थर

एकोऽहम् जैन साहब जिस तटस्थ-भाव और अविचलित स्वर में बोल रहे थे, वह मुझे चकित ही कर रहा था। उनकी जगह मैं होता तो अपनी ‘वैसी’ सफलता पर पता नहीं क्या कर बैठता! पर जैन साहब अपनी व्यक्तिगत सफलता की सूचना सहज भाव से, संयत स्वरों में ऐसे दे रहे थे मानो किसी और के किए की... [पूरी पोस्ट]
writer विष्णु बैरागी

मेरे आसपास के औलिया

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[04 Feb 2010 02:09 AM]

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