हमने लगाना चाहा मुहब्बत का शजर!!

शिल्पकार के मुख से हमने लगाना चाहा मुहब्बत का शजरमौसम मे किसने घोला है  बहुत जहरमामला संगीन हुआ वो लाए हैं खंजरपता नही कब दिखाए लहुलुहान मंजरबहुत ख़ामोशी होती है तूफान के पहलेलावा पिघलता ही है फौलाद के पहले छल करने वालों ने क्या सोचा है कभी अंगारे सुलगते हैं... [पूरी पोस्ट]
writer ललित शर्मा

कविता

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[03 Feb 2010 23:44 PM]

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