चले जा रहे हम हैं ठेले पे लद कर, खुदा यूं किसी की न मय्यत उठाए । श्रोताओं के बहुत अनुरोध पर आ रहे हैं श्री भभ्‍भड़ कवि 'भौंचक्‍के अपनी एक ग़ज़ल और एक

सुबीर संवाद सेवा म प्र इस बार के तरही को लेकर मन बहुत ही गार्डन गार्डन है । जितने उत्‍साह के साथ लोगों ने इसमें भाग लिया उससे मैं अभिभूत हूं । सबसे बड़ी बात ये है कि सबने मुशायरे में इस प्रकार से भाग लिया जैसे ये उनका अपना ही कार्यक्रम है । सच है ये आप सबका ही तो कार्यक्रम है... [पूरी पोस्ट]
writer पंकज सुबीर
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[03 Feb 2010 21:59 PM]

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