सृजन हमेशा करना है

मनोरमा इक न इक दिन मरना हैहर पल फिर क्यों डरना हैअर्थ निकलता तब जीवन का सृजन हमेशा करना हैसुख तो सबको प्यारे लगतेदुख में नहीं बिखरना हैचहुँ ओर नदियों सी बाधाहमको पार उतरना हैगलती का मानव कठपुतलानित नित हमें सुधरना हैक्षणिक चमक हो भले झूठ मेंसच से नहीं मुकरना... [पूरी पोस्ट]
writer श्यामल सुमन

कविता

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[03 Feb 2010 21:13 PM]

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