अम्मा के सपने

feminist poems मेरी अम्माबुनती थी सपनेकाश और बल्ले से,कुरुई, सिकहुलीऔर पिटारी के रूप में,रंग-बिरंगे सपने...अपनी बेटियों की शादी के,कभी चादरों और मेजपोशों परकाढ़ती थी, गुड़हल के फूल,और क्रोशिया सेबनाती थी झालरेंहमारे दहेज के लिये,खुद काट देती थीलंबी सर्दियाँएक शाल के... [पूरी पोस्ट]
writer mukti

बेटी

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[03 Feb 2010 17:01 PM]

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