उन क़दमों के निशाँ !
वो ठीक पहाड़ की चोटी पर था । जहाँ से वो उस दिशा में जाना चाहता था, जहाँ पहुँचने पर उसे मंजिल मिल जाने का एहसास हो । नही यह ठीक नहीं । उसे सम्पूर्णता का एहसास हो । जिन क़दमों के साथ वह इस चोटी पर पहुँचा था । उन पीछे रह गये क़दमों के निशाँ तो मिट गये होंगे...
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अनिल कान्त :
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[03 Feb 2010 12:41 PM]



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