वो पौध घर के साथ हमने ही लगायी थी |
एक पेड़ के छांया ने फिर हमको पनाह दी,जिस पेड़ के जड़ ने मेरी दिवार ढाई थी |टुटा जो मेरा आसियाँ गलती न थी उसकी,वो पौध घर के साथ हमने ही लगायी थी |फिर मुस्कुरा के जी सकूँ इतनी से चाह ले,आ गया सब छोड़ कर इसकी पनाह में | सिकवा गिला नहीं न कोई रंजिसे...
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Tapashwani Anand
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[03 Feb 2010 11:00 AM]



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