अभी मैं कविता के एक मुश्किल वक्फ़े में हूँ
अभी मैंकविता के उस मुश्किल वक्फ़े में हूँजहाँ अंतर्द्वंद मांग करता है एक सिगरेटऔर आस-पास के सारे लब्जकन्नी काटते लगते हैंहालांकिखुल कर सामने नहीं आ रहे अभी वेपर उनकी आँखों में इनकार की स्पष्ट रेखा हैऔर मैं भी ज्यादा जोर नहीं दे रहा उनपेये सोंच कर किकहीं...
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ओम आर्य
प्रेम कवितायेँ
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[03 Feb 2010 04:15 AM]



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