जनसत्ता को जनसत्ता ही रहने दो कोई और नाम न दो
कभी-कभी कुछ ऐसी घटनायें भी इन्सान के जीवन में घटती हैं जिससे लगता है की इन्सान के मन में ऐसे ही कोई बात या विचार नहीं आता उसका कोई न कोई पक्ष जरुर सार्थक जीवन से जुड़ा होता है। ऐसा ही कुछ आज शाम मेरे साथ हुआ जब मेरे समाचार विक्रेता ने आज ११ नवम्बर २००९...
[पूरी पोस्ट]
कौशलेन्द्र
21
1
0
1
0
[02 Feb 2010 12:24 PM]



Shuffle








