जानलेवा खेल

दिल-ए-नादाँ रात एक बजेजाने किस मूड में भेजे गए उस इमेल कोसुबह संभलने के बाद उसने ख़ारिज कर दिया हैये जिन्दगी हैलव आज कल नहींवह कहती हैमैं कहना चाहता हूँ की जिन्दगीराजश्री बैनर का सिनेमा भी तो नहींप्यार चाहे मुख़्तसर सा हो या लम्बाउससे अपरिचित हो पाना बस का नहींचाहे वो... [पूरी पोस्ट]
writer संदीप पाण्डेय

मेरी कविता

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[02 Feb 2010 07:18 AM]

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