क्यों चली आती हो
क्यों चली आती हो ख्वाबों मेंक्यों भूल जाती होतुमने ही खत्म किया थाअपने उन सारे अधिकारों कोमुझ पर सेअब इन ख्वाबों पर भीतुम्हारा कोई अधिकार नहींक्यों चली आती हो ख्यालो मेंकभी नींद चुराने, कभी चैन चुरानेतुमने ही तो मुझेअपने ख्यालों से निकाल फेंका थाअब मैं...
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कविता
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[02 Feb 2010 05:02 AM]



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