अभिलाषा नहीं पुष्प होने की

चेतना के स्वर उजाले की ओर अभिलाषा नहीं रही पुष्प होने कीचाह होती हैं बस घुटकर रोने की क्यों चढ़ाया ही जाऊं उस शीश परजो सलामी में झुका खोटे सोने कीक्यों जाऊं उन केशों में वेणी बनकरजहाँ बदबू सी हैं परफ्यूम होने की उस शहादत के पथ की भी चाह नहींकोशिश हैं जहाँ स्याही से लहू धोने... [पूरी पोस्ट]
writer चेतना के स्वर

कविता

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[02 Feb 2010 03:21 AM]

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