बनने का श्रेय..............! [कविता] - जूबी मंसूर
बार- बार बिछुड़ने परसमझाता हूं स्वयं को एक वाक्य से.....रुदन बनने का श्रेय, मिला तेरे विश्वास सेमाना कि, पीड़ा का परिचायक हूँपर साथी भी तो हूँ तेराकारण अकारण आ जानाक्या सम्बन्ध साक्ष्य नहीं मेरानिनाद हूँ टूटे भावों काक्षोभ नहीं मैं साक्ष्य हूँअतीत की...
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[02 Feb 2010 02:30 AM]



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