भूमिपुत्र [मुम्बई को जागीर समझने वालों पर मेरा विरोध]
बहुत से जानवरइलाका बनाते हैं अपनाजिसके भीतर हीभौंकते-किचकिचाते हैं,थूकते-चाटते हैं,और कोने किनारे पाये जाते हैंटाँग टेढी किये।मजाल है घुस जाये कोई?वो मानते हैं कि हमअपनी गली के शेरबखिया उधेड सकते हैंकभी भी-किसी की भीइलाका अपना है....एक आदमी, एक रोजजा रहा...
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राजीव रंजन प्रसाद
कविता
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[01 Feb 2010 22:01 PM]



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