एक कविता -अपनी-अपनी गति की ओर "ललित शर्मा"
एक सूखी टहनी परकुछ बुँदे स्वाति मेह की अनायास ही टपक गईउसने उठ कर अंगडाई ली बंधन चरमरा उठे जोड़ के टांके चटक गएजनम रहा था नया वृक्ष मै आनंदित था किअपनी ही शाख को धरती के सीने में जड़ें रोपकर पुष्पित पल्लवित होते देखूंगाएक सिरहन सी रगों में...
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ललित शर्मा
कविता
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[01 Feb 2010 22:09 PM]



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