आओ चुन लें खुद को
स्थानीय निकाय चुनाव का बिगुल बज गया है। राजनीतिक सरगरर्मियां बढऩे लगी है। गली-मोहल्ले, नुक्कड़-चौपाल, सड़क-बाजार हर ओर चुनावी रंगत जमने लगी है। राजनीति में वर्षों से रमे और राजनीति में रमने के इच्छुक आपस में जुडऩे लगे हंै। चाय की थड़ी हो या कलेक्ट्री के...
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संतोष गुप्ता
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[30 Dec 2009 05:02 AM]



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