रिश्तों में ले आएं गरमाहट
इक्कीस वीं सदी के पहले दशक के अंतिम बरस का पहला दिन हमारी देहलीज पर आ खड़ा हुआ है। बीते पल और नए क्षण के बीच भला कभी कोई फासला रहा है? हर ढलती सांझ पर नई सुबह की इबारत लिखी होती है। हमें तो उसे पढऩा और ईश्वर के भेजे संदेश को समझना भर होता है। निरंतर...
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संतोष गुप्ता
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[01 Jan 2010 02:23 AM]



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