ऐसी भी क्या जल्दी है

संवाद का सफर आज हर किसी को जल्दी है। खाते-पीते, उठते-बैठते, सोते-चलते सब फटाफट हो बस। कोई भी धैर्य और संयम रखना नहीं चाहता। मैं पिछले दिनों घर से दफ्तर के रास्ते पर था। रास्ता थोड़ा सकड़ा था। यूं मान लो कि एक तरफा था। मेरे स्कूटर के आगे एक सज्जन अंतिम यात्रा पर थे।... [पूरी पोस्ट]
writer संतोष गुप्ता
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[22 Jan 2010 02:26 AM]

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