कुछ ग्लोबलाइज़ लहरें

एक नीड़ ख्वाबों, ख्यालों और ख्वाहिशों का (ये रचना मेरे लिए ख़ास है ...उलझे दिमाग की सुलझी उपज है। उलझन की स्थिति शायद मस्तिष्क की सबसे उपजाऊ अवस्था होती है। ये रचना व्यक्ति से शुरू होकर, सामाजिक ताने बाने से गुजरती हुई वैश्विक होती है तथा भविष्य की परिकल्पना पर विराम लेती है. सिर्फ इतना अनुरोध... [पूरी पोस्ट]
writer Priya
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[01 Feb 2010 14:06 PM]

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