आभार: जे पर भनिति सुनत हरषाहीं | ते बार पुरुष बहुत जग नाहीं ||
निज कबित्त केहि लाग न नीका | सरस होउ अथवा अति फीका ||जे पर भनिति सुनत हरषाहीं | ते बार पुरुष बहुत जग नाहीं ||जग बहु नर सर सरि सम भाई | जे निज बाढी बढ़हिं जल पाई ||सज्जन सकृत सिन्धु सम कोई | देखि पूर बिधु बाढ़इ जोई ||तुलसीदास, रामचरित मानस बालकांड रसीली हो...
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Sudhir (सुधीर)
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[01 Feb 2010 12:00 PM]



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