सभ्य समाज की विरूपता और आदमी का व्याघ्र मन
(वर्ष १९८८ में मैंने यह ऊपर वाला चित्र खींचा था अपनी डायरी के एक पन्ने पर.यह चित्र हमारे समाज की विरूपता एवं उस समाज में रहने वाले आदमी के भीतर के हिंसक व्यक्तित्व (जिसे मैंने व्याघ्र मन का नाम दिया है) को दर्शाती है।उसी दौरान मैंने कुछ कवितायेँ भी लिखी...
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Nihar Khan
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[01 Feb 2010 11:50 AM]



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