इस बेतरतीब समय की तरह कुछ पंक्तियां
अखबारी उलझनों के बीच कुछ और लिखना तकरीबन असंभव होता है। फिर भी एक बदलाव, एक छुट्टी, एक हल्कापन इंतजार में आंख लगाए रहता है। तब कविता की जमीन पर लौटना होता है। यह अखबारी किचकिच से दूर जाने का सुकून भी है, और फिर मोर्चे पर आने के लिए तलाशी गई ऊर्जा का...
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सचिन ..........
कविता
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[01 Feb 2010 09:55 AM]



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