आज के पुष्प की अभिलाषा

चेतना के स्वर उजाले की ओर अभिलाषा नहीं रही पुष्प होने कीछह होती हैं बस घुटकर रोने की क्यों चढ़ाया ही जाऊं उस शीश परजो सलामी में झुका खोते सोने कीक्यों जाऊं उन केशों में वेणी बनकरजहाँ बदबू सी हैं परफ्यूम होने की उस शहादत के पथ की भी चाह नहींकोशिश हैं जहाँ स्याही से लहू धोने कीघुटता... [पूरी पोस्ट]
writer चेतना के स्वर

कविता

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[01 Feb 2010 06:55 AM]

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